सत्य संवाद विशेष: शिक्षा के नाम पर ‘सफेदपोश’ लूट, आखिर कब जागेगा प्रशासन ?
आज के दौर में शिक्षा ‘सेवा’ कम और ‘मुनाफाखोरी का धंधा’ अधिक बन चुकी है। निजी विद्यालयों की मनमानी इस कदर बढ़ गई है कि मध्यमवर्गीय अभिभावक अब खुद को असहाय और ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। आखिर इन स्कूलों को इतनी खुली छूट किसकी कृपा से मिली हुई है? क्या शिक्षा विभाग के अधिकारी केवल दफ्तरों की शोभा बढ़ाने और कागजी खानापूर्ति के लिए नियुक्त किए गए हैं?
अभिभावकों की कमर तोड़ता ‘आर्थिक बोझ’
निजी स्कूलों का आतंक अब हर घर की दहलीज तक पहुँच चुका है। हर साल महंगी किताबें बदल देना, अभिभावकों को किसी निर्धारित दुकान से ही कॉपी-किताब और यूनिफॉर्म खरीदने के लिए मजबूर करना और मनमाने ढंग से फीस बढ़ाना अब एक ‘सामान्य प्रक्रिया’ बन गई है। विभिन्न प्रकार के छिपे हुए शुल्कों (Hidden Charges) के नाम पर जो वसूली हो रही है, उसने अभिभावकों की रातों की नींद उड़ा दी है।
मान्यता का खेल और दांव पर भविष्य
हैरानी की बात तो यह है कि कई निजी विद्यालय बिना वैध मान्यता के ही धड़ल्ले से संचालित हो रहे हैं। इन स्कूलों में न तो सुरक्षा के मानक पूरे हैं और न ही शिक्षकों की योग्यता का कोई पैमाना। ऐसे में यहाँ पढ़ रहे बच्चों का भविष्य सीधे तौर पर दांव पर लगा है। सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन को इन ‘बिना मान्यता’ वाले शिक्षा के कारखानों की भनक नहीं है? या फिर ‘टेबल के नीचे’ पहुँचने वाली मोटी रकम ने जिम्मेदार आँखों पर पट्टी बाँध दी है?
जांच के नाम पर केवल औपचारिकता
जब भी कोई शिकायत होती है, तो विभाग जांच का भरोसा देता है। लेकिन धरातल पर स्थिति ढाक के तीन पात वाली ही रहती है। ऐसा प्रतीत होता है कि निरीक्षण केवल एक औपचारिकता बनकर रह गया है। नियम केवल कागजों तक सीमित हैं और रसूखदार स्कूल संचालकों के सामने तंत्र नतमस्तक है।
“शिक्षा अधिकार है, व्यापार नहीं।” यह नारा आज केवल दीवारों पर लिखा अच्छा लगता है, क्योंकि हकीकत में शिक्षा व्यवस्था व्यावसायिक शोषण का सबसे बड़ा माध्यम बन चुकी है।
सत्य संवाद की मांग
यदि सरकार और प्रशासन वास्तव में जनता के प्रति जवाबदेह हैं, तो उन्हें तत्काल निम्नलिखित कदम उठाने होंगे:
- निजी विद्यालयों की फीस वृद्धि और मान्यता की निष्पक्ष जांच हो।
- किताबों और यूनिफॉर्म के नाम पर होने वाले कमीशन के खेल को रोका जाए।
- नियमों का उल्लंघन करने वाले स्कूलों पर केवल जुर्माना न लगे, बल्कि उनकी मान्यता रद्द की जाए।
अभिभावकों का धैर्य अब जवाब दे रहा है। अगर समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो यह आक्रोश आने वाले समय में एक बड़े जनांदोलन का रूप ले सकता है। अंत में, उन अधिकारियों के लिए बस इतना ही कहना पर्याप्त है कि यदि व्यवस्था को सुधारने की इच्छाशक्ति नहीं है, तो आत्मग्लानि के लिए ‘चुल्लू भर पानी’ भी काफी है।
रिपोर्ट: माधवेंद्र सिंह, सत्य संवाद

