
फाइलों में दबा कटनी का विकास: 6 साल, ₹265 करोड़ की योजनाएं और नतीजा ‘शून्य’
अधिकारियों की लापरवाही और लालफीताशाही से अटके कटनी के प्रमुख ड्रीम प्रोजेक्ट्स, सरकारी जमीनें बेचने की योजना पर जनता में भारी आक्रोश।
कटनी | सत्य संवाद
कटनी शहर को आधुनिक रूप देने, बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करने और ऐतिहासिक इमारतों को सहेजने के लिए वर्ष 2020 में बनी ₹265 करोड़ की वृहद विकास योजना प्रशासनिक सुस्ती की बलि चढ़ गई है। 6 साल बीत जाने के बाद भी यह महत्वाकांक्षी योजना गृह निर्माण मंडल (हाउसिंग बोर्ड), नगर तथा ग्राम निवेश (TNCP) और साधिकार समिति के दफ्तरों की फाइलों में धूल फांक रही है।
हर साल होने वाली प्रशासनिक समीक्षा बैठकों में केवल खोखले निर्देश दिए जाते हैं, लेकिन धरातल पर स्थिति जस की तस बनी हुई है।
फाइलों के खेल में अटके प्रमुख प्रोजेक्ट्स
- पुरानी तहसील परिसर का विकास (लागत: ₹116 करोड़): 1.56 हेक्टेयर जमीन पर संयुक्त कार्यालय परिसर, ₹20 करोड़ की लागत से आधुनिक दुकानें और सिविल डिफेंस सेंटर बनाने की योजना थी। इसके अलावा बहोरीबंद, ढीमरखेड़ा और विजयराघवगढ़ में नए क्वार्टर निर्माण का प्रस्ताव 21 अक्टूबर 2021 से समिति के पास अटका हुआ है।
- ऐतिहासिक साधुराम स्कूल का कायाकल्प:
- स्कूल नवीनीकरण: ₹4.95 करोड़
- मल्टीपर्पज पार्किंग: ₹8.88 करोड़
- जीएडी क्वार्टर (77 नए): ₹13.57 करोड़ इसके अलावा पीडब्ल्यूडी दफ्तर, स्टोर और फायर फाइटिंग सिस्टम का काम भी फाइलों से बाहर नहीं निकल सका।
- रेस्टहाउस की जमीन बेचने की योजना (लक्ष्य: ₹99.62 करोड़): सिविल लाइन स्थित रेस्टहाउस की 9,024 वर्ग मीटर बेशकीमती जमीन को व्यावसायिक उपयोग के लिए बेचने का प्रस्ताव 1 सितंबर 2025 को टीएनसीपी को भेजा गया था, जो आज तक लंबित है।
सरकारी संपत्ति बेचने के प्रस्ताव पर भड़की जनता
रेस्टहाउस और पुरानी कचहरी भवन जैसी ऐतिहासिक एवं बेशकीमती सरकारी जमीनों को निजी हाथों या व्यावसायिक उपयोग के लिए बेचने की योजना से शहरवासियों में गहरा असंतोष है। आम नागरिकों का स्पष्ट कहना है कि सरकार को शहर की अमूल्य धरोहरों और जमीनों को बेचने के बजाय, उन्हीं स्थानों पर जनसुविधाओं और नए सरकारी भवनों का निर्माण करना चाहिए।
देरी से बढ़ेगी लागत, खंडहर में तब्दील हो रही धरोहरें
परियोजनाओं में हो रही इस लेट-लतीफी से आने वाले समय में निर्माण सामग्री के दाम बढ़ने से बजट में भारी बढ़ोतरी होगी, जिसका सीधा बोझ जनता के टैक्स के पैसों पर पड़ेगा। वहीं दूसरी ओर, रखरखाव और जीर्णोद्धार न होने के कारण शहर की ऐतिहासिक इमारतें धीरे-धीरे जर्जर होकर खंडहर बनती जा रही हैं।
