प्रतिशोध की आग में दिव्यांग शिक्षक के हक को स्वाहा करने की तैयारी ! (42 साल की सेवा के बाद भी अर्जित अवकाश के लिए दर-दर भटक रहे ‘गुरुजी’*)

प्रतिशोध की आग में दिव्यांग शिक्षक के हक को स्वाहा करने की तैयारी ! (42 साल की सेवा के बाद भी अर्जित अवकाश के लिए दर-दर भटक रहे ‘गुरुजी’*)

कटनी। शिक्षा विभाग में पूर्वाग्रह और बदले की भावना किस कदर हावी है, इसका एक जीता-जागता उदाहरण एन.के.जे. संकुल में देखने को मिल रहा है। लगातार 42 वर्षों तक विभाग को अपनी सेवाएं देने वाले एक दिव्यांग शिक्षक को सेवानिवृत्ति के बाद अपने ही हक (अर्जित अवकाश के नगदीकरण) के लिए उन्हें न्यायालय की शरण लेनी पड़ रही है। मामला अब प्रदेश स्तर पर दिव्यांगों के कल्याण हेतु गठित विशेष न्यायालय भोपाल पहुँच चुका है।

*क्या है पूरा विवाद?*
एन.के.जे. विद्यालय उपनगरीय क्षेत्र कटनी से सितंबर 2025 में सेवानिवृत्त हुए दिव्यांग सहायक शिक्षक मार्तण्ड सिंह राजपूत का आरोप है कि संकुल प्राचार्य एन.के.जे. द्वारा उनके सेवा अभिलेख में जानबूझकर उनके अर्जित अवकाश नहीं चढ़ाये हैँ ।सेवा निवृत्त शिक्षक मार्तण्ड सिंह राजपूत,विभिन्न कर्मचारी संगठनों में पदाधिकारी रहेचुके हैं और अपने सेवाकाल के दौरान उन्होंने कई बार प्राचार्य एन के जे के ‘शिक्षक विरोधी कृत्यों’ पर उन्हें कर्तव्यबोध कराया था। आरोप है कि इसी का बदला लेने के लिए प्राचार्य ने उनके अर्जित अवकाश की गणना सीटआधी अधूरी तैयार करके अनुमोदन हेतु वरिष्ठ अधिकारीयों को भेजा गया है ।

*2012 से अटकी है गणना, हक से वंचित करने की साजिश?*
जानकारी के अनुसार, वर्ष 2012 से लेकर सेवानिवृत्ति के समय तक के उन तमाम आदेशों को शिक्षक की सेवा पुस्तिका (Service Book) में दर्ज नहीं किया गया, जिनका लाभ पाने के वे हकदार हैं। संकुल प्राचार्य की इस कथित “बदले की मानसिकता” के कारण शिक्षक को लाखों रुपये के अर्जित अवकाश लाभ से वंचित होना पड़ रहा है।

*कलेक्टर से गुहार बेअसर, अब ‘दिव्यांग न्यायालय’ में मामला*
दिव्यांग शिक्षक ने इस अन्याय की शिकायत कई बार जिले के संवेदनशील कलेक्टर से भी की, लेकिन शिक्षा विभाग के अधिकारियों के गैर-जिम्मेदाराना और “नैरस्यमय” रवैये के कारण मामले का निराकरण आज पर्यन्त तक नहीं हो सका। थक-हारकर अब शिक्षक ने दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 की धारा 82 के तहत गठित न्यायालय, भोपाल में अपना पक्ष रखा है।

*विभाग की छवि पर सवाल*
42 साल तक बच्चों का भविष्य संवारने वाले एक दिव्यांग शिक्षक को अपने बुढ़ापे की जमा पूंजी के लिए सिस्टम से इस कदर लड़ना पड़ रहा है, जो विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। अब देखना यह होगा कि भोपाल स्थित विशेष न्यायालय से इस पीड़ित शिक्षक को कब तक न्याय मिल पाता है।

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