MP: कर्ज का बोझ और मुस्लिम आबादी दोनों सुरसा की तरह बढ़ रही हैं!

भोपाल। मध्य प्रदेश इस समय एक गंभीर आर्थिक और सामाजिक चौराहे पर खड़ा नजर आ रहा है। एक तरफ जहां राज्य सरकार अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए लगातार कर्ज के जाल में उलझती जा रही है, वहीं दूसरी तरफ जनसांख्यिकीय आंकड़े भविष्य की एक चिंताजनक तस्वीर पेश कर रहे हैं। विशेषज्ञों और हालिया रिपोर्टों के अनुसार, प्रदेश पर कर्ज का बोझ और आबादी का बदलता स्वरूप दोनों ही ‘सुरसा के मुख’ की तरह तेजी से बढ़ रहे हैं।

आर्थिक संकट: कर्ज के तले दबती भविष्य की पीढ़ी

​हालिया जानकारी के अनुसार, मध्य प्रदेश सरकार ने एक बार फिर 1800 करोड़ रुपये का नया कर्ज लिया है, जो 7.86 प्रतिशत की वार्षिक ब्याज दर पर उठाया गया है। वित्तीय वर्ष की शुरुआत को अभी महज डेढ़ महीना ही बीता है और सरकार अब तक लगभग 4,600 करोड़ रुपये का ऋण ले चुकी है।

​आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश में जन्म लेने वाला हर बच्चा अपने साथ करीब 60 हजार रुपये का कर्ज लेकर पैदा हो रहा है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सरकार हर महीने केवल ब्याज चुकाने के लिए 2,386 करोड़ रुपये खर्च कर रही है। राज्य का कुल ब्याज बोझ अब 28,000 करोड़ रुपये के पार पहुंच चुका है।

जनसांख्यिकीय बदलाव: 2047 की भयावह तस्वीर?

​आर्थिक मोर्चे के साथ-साथ राज्य के सामाजिक ताने-बाने को लेकर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। रिपोर्टों के अनुसार, मध्य प्रदेश की जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) में हिंदुओं का योगदान लगभग 90.89% है, जबकि मुस्लिम आबादी का योगदान महज 6.57% के करीब है।

​अपुष्ट शोध और आंकड़ों का हवाला देते हुए यह चिंता जताई जा रही है कि मुस्लिम आबादी की वृद्धि दर हिंदू आबादी की तुलना में कहीं अधिक है। यदि यही रुझान जारी रहा, तो 2047 तक प्रदेश की जनसांख्यिकीय स्थिति पूरी तरह बदल सकती है, जो भविष्य में सामाजिक और आर्थिक अस्थिरता का कारण बन सकती है।

क्या हैं समाधान के रास्ते?

​विशेषज्ञों का मानना है कि मुख्यमंत्री मोहन यादव को राज्य को इस वित्तीय दलदल से निकालने के लिए कठोर कदम उठाने होंगे:

  1. फिजूलखर्ची पर रोक: सरकारी विज्ञापनों, होर्डिंग्स और आयोजनों पर होने वाले सालाना 2,000-3,000 करोड़ रुपये के खर्च में कटौती की आवश्यकता है।
  2. विदेशी दौरों और भत्तों पर लगाम: मंत्रियों और अधिकारियों की यात्राओं पर होने वाले 1,500 करोड़ के खर्च को वर्चुअल मीटिंग्स के जरिए कम किया जा सकता है।
  3. राजस्व में वृद्धि: जीएसटी चोरी को सख्ती से रोककर और सरकारी संपत्तियों के प्रबंधन से सालाना 10,000 से 15,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त आय जुटाई जा सकती है।
  4. घाटे वाले निगमों में सुधार: घाटे में चल रहे सार्वजनिक उपक्रमों (PSU) को मुनाफे में लाना सरकार के लिए बड़ी चुनौती है।

निष्कर्ष:

मध्य प्रदेश की आर्थिक स्थिति ‘ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्’ (कर्ज लेकर घी पीना) वाली कहावत को चरितार्थ कर रही है। यदि समय रहते बढ़ते कर्ज और आबादी के असंतुलन पर ठोस नीतिगत निर्णय नहीं लिए गए, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अराजक और कमजोर प्रदेश विरासत में बचेगा।

रिपोर्ट: ब्यूरो चीफ, सत्य संवाद समाचार