सरकारी अस्पताल या दलालों का अड्डा? कटनी जिला अस्पताल से ग्राउंड रिपोर्ट: जहां बीमारी से ज्यादा व्यवस्था देती है दर्द
कटनी। गरीब, मजदूर, किसान और मध्यमवर्गीय परिवार का कोई व्यक्ति जब बीमार पड़ता है, तो उसकी पहली और आखिरी उम्मीद सरकारी अस्पताल होता है। उसे विश्वास होता है कि सरकार ने ये आलीशान इमारतें इसलिए बनाई हैं ताकि हर नागरिक को बिना किसी आर्थिक बोझ के बेहतर इलाज मिल सके। लेकिन जब वह अस्पताल के दरवाजे पर पहुंचता है, तो उसका सामना एक ऐसी कड़वी और डरावनी हकीकत से होता है जो उसकी बीमारी से भी ज्यादा दर्दनाक होती है।
कटनी का सरकारी अस्पताल आज ऐसे ही गंभीर और सुलगते सवालों के घेरे में खड़ा दिखाई दे रहा है।
बीमारी का डर और कमीशन का खेल: ‘यहाँ सुविधा नहीं है, तुरंत प्राइवेट जाओ’
अस्पताल में इलाज की उम्मीद लेकर आने वाले कई मरीजों और उनके परिजनों का सीधा आरोप है कि यहाँ इलाज के नाम पर सिर्फ ‘डर का व्यापार’ चल रहा है। मरीज की हालत को जानबूझकर इतना गंभीर बता दिया जाता है कि परिजन खौफ में आ जाएं।
परिजनों का आरोप: “मरीज को देखते ही कह दिया जाता है कि हालत बहुत गंभीर है, यहाँ इलाज संभव नहीं है, मशीनें खराब हैं, सुविधाएं नहीं हैं… तुरंत किसी निजी अस्पताल ले जाओ, नहीं तो जान को खतरा हो सकता है।”
अपने परिजन की जिंदगी बचाने की छटपटाहट में डूबा परिवार उस समय कोई सवाल नहीं कर पाता। उसका फायदा उठाकर अस्पताल परिसर में सक्रिय ‘दलालों का सिंडिकेट’ तुरंत सक्रिय होता है और मरीज को चुनिंदा निजी अस्पतालों की ओर धकेल दिया जाता है। इसके बाद शुरू होता है कमीशनखोरी का वो गंदा खेल, जो मानवता के नाम पर एक बड़ा कलंक है।
एक रेफर… और टूट जाती है गरीब की आर्थिक कमर
सरकारी अस्पताल से रेफर होने के बाद शुरू होता है कर्ज, जमीन गिरवी रखने, जेवर बेचने और जिंदगी भर की जमा पूंजी खत्म होने का एक अंतहीन सिलसिला। निजी अस्पतालों के भारी-भरकम बिल कई हंसते-खेलते परिवारों की आर्थिक रीढ़ तोड़ देते हैं।
- जिस बीमारी का इलाज सरकारी अस्पताल में मुफ्त या बेहद कम खर्च में हो सकता था,
- वही इलाज निजी अस्पतालों में कई गुना महंगा होकर गरीब परिवार को बरसों के कर्ज के दलदल में डुबो देता है।
जनता के टैक्स के करोड़ों रुपये… फिर क्यों सफेद हाथी बनी व्यवस्था?
’सत्य संवाद’ इस व्यवस्था से कुछ सीधे और तीखे सवाल पूछता है:
- यदि सरकारी अस्पतालों में मरीजों का इलाज ही नहीं होना है, तो फिर जनता की गाढ़ी कमाई के करोड़ों रुपये खर्च करके ये भव्य अस्पताल क्यों बनाए गए?
- डॉक्टरों, कर्मचारियों की भारी-भरकम सैलरी, महंगी मशीनों और दवाइयों पर बजट क्यों पानी की तरह बहाया जा रहा है?
- अगर हर गंभीर मरीज को अंततः निजी अस्पताल ही रेफर करना है, तो इस सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था का औचित्य क्या है?
आम आदमी टैक्स देता है, वोट देता है, सरकारें चुनता है, लेकिन जब उसे सबसे ज्यादा जरूरत होती है, तब यही सिस्टम उसे लाचार और असहाय छोड़कर तमाशा देखता है।
नेताओं के बड़े-बड़े वादे, लेकिन धरातल पर सिर्फ ‘फोटोबाजी’
चुनाव के समय जो नेता गांव-गांव, गली-गली जाकर हाथ जोड़ते हैं और स्वास्थ्य व्यवस्था सुधारने के बड़े-बड़े दावे करते हैं, वे जीत के बाद गायब हो जाते हैं।
- कितने नेता बिना सूचना दिए, बिना सुरक्षा तामझाम के कभी अचानक सरकारी अस्पताल का औचक निरीक्षण करने पहुंचते हैं?
- कितने जनप्रतिनिधि मरीजों के बीच बैठकर उनकी वास्तविक पीड़ा सुनते हैं?
दुर्भाग्य से, आज नेताओं का ध्यान जमीनी समस्याओं के समाधान से ज्यादा सोशल मीडिया पर फोटो, बयान और आत्म-प्रचार पर केंद्रित दिखाई देता है। जनता की पीड़ा चुनावी भाषणों में तो खूब चमकती है, लेकिन हकीकत में गायब रहती है।
‘सत्य संवाद’ की मांग: जवाबदेही तय हो, दलाली बंद हो!
आज कटनी और पूरे प्रदेश को केवल अस्पतालों की नई इमारतों की जरूरत नहीं है, बल्कि जवाबदेही (Accountability) की जरूरत है।
- एक ऐसी व्यवस्था बने जहां मरीज को डराकर नहीं, बल्कि भरोसा देकर इलाज किया जाए।
- डॉक्टर सेवा का प्रतीक बनें, दलाली का नहीं।
- जनप्रतिनिधि नियमित रूप से अस्पतालों का निरीक्षण करें और दलालों व भ्रष्ट तत्वों पर सीधे एफआईआर दर्ज कराएं।
जब तक सरकारी अस्पतालों में इस दलाली और कमीशनखोरी के नेटवर्क को ध्वस्त नहीं किया जाएगा, तब तक जनता का भरोसा इस लोकतांत्रिक तंत्र से उठता रहेगा। और याद रहे…
“गरीब को दया की भीख नहीं, अपना अधिकार चाहिए। उसे खोखले भाषण नहीं, ईमानदार इलाज चाहिए। क्योंकि स्वास्थ्य सेवा कोई व्यापार नहीं, इस देश की जनता का बुनियादी अधिकार है।”
– ब्यूरो रिपोर्ट, सत्य संवाद।

