दद्दाधाम कॉलोनी में मनाई गई श्रीमंत बाजीराव पेशवा की जन्मजयंती: 42 युद्धों के विजेता और हिन्दवी स्वराज्य के रक्षक को नागरिकों ने दी श्रद्धांजलि
कटनी। महान पराक्रमी योद्धा, हिन्दवी स्वराज्य के अद्वितीय सेनानी और भारतभूमि के गौरवशाली नायक श्रीमंत बाजीराव बल्लाल भट्ट पेशवा की जन्मजयंती का पावन अवसर दद्दाधाम कॉलोनी, झिंझरी (कटनी) में अत्यन्त श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ मनाया गया। इस अवसर पर श्री माधवेंद्र सिंह जी के निज निवास पर एक गरिमामय कार्यक्रम का आयोजन संपन्न हुआ, जिसमें कॉलोनी के अनेक गणमान्य नागरिकों, समाजसेवियों एवं बुद्धिजीवियों ने उपस्थित होकर राष्ट्रनायक श्रीमंत बाजीराव पेशवा के चरणों में श्रद्धासुमन अर्पित किए।
कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रेलवे के सेवानिवृत्त उपमुख्य अभियंता श्री एस. पी. तिवारी जी ने बाजीराव पेशवा के जीवन और उनके शौर्य की गाथा पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि बाजीराव केवल मराठा साम्राज्य के सेनानी ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण भारत की सांस्कृतिक अस्मिता के रक्षक और सभ्यता-संघर्ष के प्रहरी थे। उन्होंने छत्रपति शिवाजी महाराज के “हिन्दवी स्वराज” के स्वप्न को साकार कर उसका परचम पूरे भारतवर्ष में लहराया।
छत्रसाल की पुकार और बाजीराव का त्वरित निर्णय
श्री तिवारी जी ने महाराजा छत्रसाल और बाजीराव पेशवा के ऐतिहासिक प्रसंग का स्मरण कराते हुए बताया कि जब बुंदेलखंड के महाराजा छत्रसाल मुग़ल सरदार मोहम्मद खान बंगश से घिरे, तब उन्होंने बाजीराव से सहायता माँगी। संदेश मिलते ही भोजन छोड़ते हुए बाजीराव ने कहा— “यदि मुझे पहुँचने में देर हो गई, तो इतिहास लिखेगा कि एक राजपूत ने मदद माँगी और ब्राह्मण भोजन करता रहा।” वे तुरंत अपनी सेना के साथ रवाना हुए और मुग़ल अत्याचार से बुंदेलखंड को मुक्त कराकर मराठा-बुंदेला मैत्री को अमर कर दिया।
इतिहास का अद्वितीय और सबसे तेज़ सैन्य अभियान
अपने वक्तव्य में उन्होंने बाजीराव के अद्भुत युद्ध कौशल का उल्लेख करते हुए बताया कि उन्होंने मात्र 48 घंटे में 500 घोड़ों के साथ 10 दिनों की दूरी तय की थी। भारतीय इतिहास में इस प्रकार के तीव्र गति सैन्य अभियानों में केवल दो ही नाम दर्ज हैं— पहला अकबर का गुजरात अभियान और दूसरा बाजीराव का दिल्ली पर आक्रमण।
सन् 1737 में मात्र 19-20 वर्ष की आयु में बाजीराव ने दिल्ली (वर्तमान तालकटोरा स्टेडियम क्षेत्र) पर डेरा डालकर मुग़ल सत्ता की जड़ों को हिला दिया था। उनके भय से मुग़ल बादशाह लाल किले के गुप्त तहखाने में छिपने को मजबूर हो गया था।
42 युद्धों में अजेय रहने वाले महान योद्धा
भारतीय इतिहास के एकमात्र ऐसे योद्धा श्रीमंत बाजीराव बल्लाल थे, जिन्होंने अपने 40 वर्ष के जीवनकाल में 42 बड़े युद्ध लड़े और एक भी युद्ध में पराजय का सामना नहीं किया। वे वास्तव में भारतभूमि के अपराजेय और अनुपम सेनानी थे।
कार्यक्रम के समापन पर उपस्थित सभी प्रबुद्ध नागरिकों ने बाजीराव पेशवा के जीवन से प्रेरणा लेते हुए राष्ट्र, संस्कृति और सभ्यता की रक्षा तथा संवर्धन के लिए सदैव तत्पर रहने का सामूहिक संकल्प लिया।

