- ⚔️ जो जीता, वो बाजीराव! ⚔️आज 18 अगस्त को भारत के महा पराक्रमी, अजेय सेनानायक #श्रीमंत_बाजीराव_बल्लाळ_भट्ट जी की 326वीं जन्म जयंत है। यह उस महायोद्धा का स्मरण करने का दिन है जिसने दिल्ली सल्तनत की हनक को मिट्टी में मिला दिया था।श्रीमंत बाजीराव एक ऐसे अजेय योद्धा थे जिनकी तलवार के खौफ से उत्तर से लेकर दक्षिण और पूर्व से लेकर पश्चिम तक के शत्रु थर-थर कांपते थे:💥 उत्तर में: मुगलों, अफगानों और अवध के शिया नवाबों को धूल चटाई।💥 मध्य भारत में: बंगश

खान और भोपाल के नवाब को घुटने टेकने पर मजबूर किया।💥 दक्षिण में: निजाम उल मुल्क, आदिलशाही और फ्रांसीसियों को मात दी।💥 पश्चिम में: ब्रिटिश, पुर्तगालियों, जंजीरा के सिद्दी और गुजरात के सूबेदार सरबुलंद खान को झुका कर अपने अधीन किया।🚩 केवल साम्राज्य विस्तार नहीं, बल्कि सच्चे ‘धर्मरक्षक’:बाजीराव जी ने हिंदुओं को उनके धर्म पालन, त्योहारों और परंपराओं के निर्वहन की स्वतंत्रता दिलाई। बारह में से जिन सात #ज्योतिर्लिंगों पर विधर्मियों ने पूजा-अर्चना बंद करवा दी थी, उन्हें मुक्त करा कर पुनः विधि-विधान से मंत्रोच्चार शुरू करवाया। क्षतिग्रस्त मंदिरों, घाटों और मठों का जीर्णोद्धार करवाया।पिछले एक हजार वर्ष के इतिहास में ‘अटक से कटक’ तक सिर्फ एक बार भगवा ध्वज फहराया गया है, और इस हिंदवी सेना का नेतृत्व श्रीमंत बाजीराव ने दिल्ली तक किया था!🙏 मेरा आप सभी से विनम्र आग्रह है:कल अपने नगर, गांव, या चौराहे पर श्रीमंत बाजीराव जी की जन्म जयंती पर कृतज्ञता के भाव से पुष्पांजलि का कार्यक्रम अवश्य रखिए। हाथों में भगवा ध्वज उठाकर एक बाइक रैली निकालिए। सोशल मीडिया पर लिखिए, बोलिए, पॉडकास्ट कीजिए, लाइव आकर अपने सर्वश्रेष्ठ नायक का गौरव गान कीजिए!नई पीढ़ी और युवाओं को बताइए कि हमारा इतिहास कितना गौरवशाली रहा है।जय बाजीराव! जय हिंदवी स्वराज्य! 🚩⚔️
🚩 पेशवा बाजीराव बल्लाल — पूरा जीवन क्रमवार
1. जन्म — 18 अगस्त 1700
बाजीराव बल्लाल भट्ट, जिन्हें इतिहास में पेशवा बाजीराव प्रथम या थोरले बाजीराव कहा जाता है, का जन्म 18 अगस्त 1700 को हुआ माना जाता है। उनके पिता बालाजी विश्वनाथ भट्ट और माता राधाबाई थीं। उनका जन्मस्थान सामान्यतः डुबेर/सिन्नर क्षेत्र, वर्तमान नासिक के निकट माना जाता है।
उनके छोटे भाई चिमाजी अप्पा आगे चलकर स्वयं महान मराठा सेनानायक बने।
बाजीराव का बचपन सामान्य राजकुमार की तरह नहीं था। उनके पिता स्वयं मराठा राजनीति और सैन्य अभियानों के केंद्र में थे। इसलिए बाजीराव को छोटी उम्र से ही:
घुड़सवारी
शस्त्र संचालन
युद्धनीति
प्रशासन
कूटनीति
विभिन्न मराठा सरदारों के साथ संबंध
का अनुभव मिलने लगा।
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2. पिता के साथ राजनीतिक और सैन्य अनुभव
बालाजी विश्वनाथ छत्रपति शाहू महाराज के पेशवा थे। बाजीराव कई अभियानों में अपने पिता के साथ रहे और उन्हें प्रत्यक्ष रूप से समझने का अवसर मिला कि मुगल, निजाम, मराठा सरदार और अन्य क्षेत्रीय शक्तियाँ किस प्रकार राजनीति कर रही थीं।
इसी दौर ने उनके अंदर एक बात मजबूत की—मराठा शक्ति को केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं रखना है।
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3. 1718–1719 — दिल्ली की यात्रा
युवा बाजीराव ने अपने पिता के साथ उत्तर भारत और दिल्ली की राजनीति को भी देखा। उस समय मुगल साम्राज्य आंतरिक संघर्षों से कमजोर हो रहा था।
इस अनुभव का प्रभाव आगे उनके राजनीतिक दृष्टिकोण पर पड़ा। उन्होंने समझ लिया कि दिल्ली की सत्ता जितनी शक्तिशाली दिखाई देती है, वास्तव में उतनी मजबूत नहीं है।
यही कारण है कि बाद में बाजीराव ने मराठा सेना को सीधे उत्तर भारत तक पहुँचाने की रणनीति अपनाई।
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4. 1720 — केवल लगभग 20 वर्ष की उम्र में पेशवा
12 अप्रैल 1720 को बालाजी विश्वनाथ का निधन हुआ।
इसके बाद छत्रपति शाहू महाराज ने अत्यंत कम उम्र के बाजीराव को अपना पेशवा नियुक्त किया। उनका कार्यकाल 1720 से 1740 तक रहा।
यह फैसला उस समय असाधारण था।
दरबार में कई अनुभवी लोग मौजूद थे, फिर भी शाहू महाराज ने युवा बाजीराव की प्रतिभा पर भरोसा किया।
यहीं से शुरू हुआ उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय।
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5. बाजीराव का लक्ष्य
बाजीराव केवल युद्ध जीतने वाले सेनापति नहीं थे। उनका बड़ा राजनीतिक उद्देश्य था कि मराठा शक्ति को दक्कन से बाहर निकालकर मालवा, गुजरात, बुंदेलखंड और उत्तर भारत में प्रभावशाली बनाया जाए।
उनकी रणनीति भारी सेना के बजाय:
तेज घुड़सवार सेना + अचानक दिशा परिवर्तन + दुश्मन की रसद काटना + तेजी से लंबी दूरी तय करना
पर आधारित थी।
इसी सैन्य गतिशीलता ने उन्हें अपने समय के सबसे प्रभावशाली सेनानायकों में स्थान दिया।
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6. 1720–1727 — दक्कन में शक्ति मजबूत करना
पेशवा बनने के बाद बाजीराव को कई मोर्चों का सामना करना पड़ा।
सबसे बड़ी चुनौती थी हैदराबाद का निजाम-उल-मुल्क आसफ जाह।
निजाम स्वयं भी दक्कन में एक बड़ी शक्ति बन चुका था और मराठों के बढ़ते प्रभाव को रोकना चाहता था।
दोनों के बीच संघर्ष धीरे-धीरे बढ़ता गया।
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7. 1727–1728 — पालखेड़ का अभियान
यह बाजीराव के जीवन का सबसे प्रसिद्ध सैन्य अभियान है।
निजाम की सेना बड़ी और मजबूत थी। लेकिन बाजीराव ने उसकी ताकत से सीधे टकराने के बजाय गतिशील युद्धनीति अपनाई।
उन्होंने अपनी घुड़सवार सेना को तेजी से अलग-अलग दिशाओं में चलाया और निजाम की सेना को ऐसी स्थिति में पहुँचा दिया जहाँ उसकी रसद और आपूर्ति गंभीर समस्या बन गई।
अंततः 1728 में पालखेड़ अभियान में निजाम को समझौता करना पड़ा।
इस विजय ने दक्कन में मराठों की स्थिति अत्यंत मजबूत कर दी। सैन्य इतिहास में पालखेड़ अभियान को बाजीराव की रणनीतिक गतिशीलता का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है।
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8. 1729 — बुंदेलखंड और महाराजा छत्रसाल
अब बाजीराव का ध्यान उत्तर भारत की ओर गया।
महाराजा छत्रसाल बुंदेला बुंदेलखंड के शक्तिशाली शासक थे। मुगल पक्ष के सेनापति मुहम्मद खान बंगश ने उनके विरुद्ध अभियान चलाया।
छत्रसाल कठिन परिस्थिति में थे और उन्होंने बाजीराव से सहायता मांगी।
बाजीराव ने तेजी से उत्तर की ओर कूच किया और छत्रसाल की सहायता की।
इस अभियान के बाद बुंदेलखंड में मराठों का प्रभाव बहुत मजबूत हुआ।
छत्रसाल और बाजीराव के संबंधों से जुड़ी अनेक लोकप्रिय कथाएँ हैं। इनमें मस्तानी का प्रसंग भी आता है। लेकिन मस्तानी के संबंध में फिल्मों और लोककथाओं में कही गई हर बात को प्रमाणित इतिहास नहीं माना जा सकता।
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9. 1730–1731 — गुजरात का प्रश्न और डाभोई
बाजीराव के सामने अब केवल मुगल और निजाम ही चुनौती नहीं थे।
मराठा साम्राज्य के अंदर भी अलग-अलग सरदारों के बीच अधिकार और राजस्व को लेकर संघर्ष था।
1731 में डाभोई का संघर्ष हुआ, जिसमें बाजीराव ने त्र्यंबकराव दाभाड़े के विद्रोह को दबाया।
इससे पेशवा की केंद्रीय सत्ता मजबूत हुई।
यह घटना महत्वपूर्ण है क्योंकि बाजीराव को केवल बाहरी दुश्मनों से नहीं, बल्कि मराठा राजनीतिक व्यवस्था के भीतर भी संतुलन बनाना पड़ता था।
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10. 1730 के दशक — मालवा और उत्तर भारत
अब मराठा प्रभाव:
महाराष्ट्र → गुजरात → मालवा → बुंदेलखंड
तक फैल रहा था।
बाजीराव ने अलग-अलग मराठा सरदारों को उत्तर भारत में आगे बढ़ने का अवसर दिया।
इसी दौर में मल्हारराव होलकर, राणोजी सिंधिया और अन्य सरदारों का प्रभाव बढ़ा।
आगे चलकर यही शक्तियाँ मराठा साम्राज्य के बड़े स्तंभ बनीं।
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11. 1737 — दिल्ली की ओर बिजली जैसी दौड़
यह बाजीराव के जीवन का शायद सबसे रोमांचक अभियान था।
1737 में बाजीराव ने दिल्ली की ओर तेजी से कूच किया।
मुगल सत्ता को अंदाजा नहीं था कि मराठा सेना इतनी तेजी से दिल्ली के निकट पहुँच जाएगी।
बाजीराव की सेना ने लंबी दूरी तय करते हुए मुगल सेना को आश्चर्यचकित कर दिया।
28 मार्च 1737 को दिल्ली के निकट संघर्ष में मराठों ने मुगल सेना को पराजित किया। इसके बाद बाजीराव ने बड़ी मुगल सेना के आने से पहले वापस हटने का निर्णय लिया।
यह केवल एक युद्ध नहीं था।
इसने पूरे उत्तर भारत को संदेश दिया:
> मराठा शक्ति अब दक्कन तक सीमित नहीं रही थी।
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12. 1737–1738 — भोपाल अभियान
दिल्ली अभियान से मुगल सम्राट मुहम्मद शाह चिंतित हुआ और उसने निजाम से सहायता मांगी।
निजाम दक्षिण से उत्तर की ओर आया।
बाजीराव ने फिर वही रणनीति अपनाई—सीधी निर्णायक लड़ाई के बजाय घेराबंदी और रसद पर नियंत्रण।
निजाम की सेना भोपाल में फँस गई।
बाजीराव ने बाहर से आने वाली सहायता रोक दी और उसकी रसद पर दबाव बढ़ाया।
अंततः 7 जनवरी 1738 को दुराहा/दोरणा क्षेत्र में समझौता हुआ, जिसमें मालवा पर मराठों के अधिकार को महत्वपूर्ण मान्यता मिली और मुगल पक्ष को आर्थिक शर्तें स्वीकार करनी पड़ीं।
यह बाजीराव की सबसे बड़ी राजनीतिक-सैन्य उपलब्धियों में से एक थी।
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13. 1737–1739 — पुर्तगालियों के विरुद्ध अभियान
इसी समय पश्चिमी तट पर पुर्तगाली शक्ति भी चुनौती थी।
बाजीराव के भाई चिमाजी अप्पा ने पुर्तगालियों के विरुद्ध अभियान का नेतृत्व किया।
मराठों ने वसई और आसपास के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त की।
1739 में वसई की विजय मराठा इतिहास की बड़ी उपलब्धियों में गिनी जाती है। इसमें चिमाजी अप्पा की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण थी।
इससे स्पष्ट होता है कि बाजीराव की सैन्य व्यवस्था केवल उत्तर भारत तक सीमित नहीं थी।
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14. 1739 — नादिर शाह का भारत पर आक्रमण
इसी समय फारस के शासक नादिर शाह ने भारत पर आक्रमण किया और दिल्ली पर कब्जा कर लिया।
बाजीराव इस संकट से चिंतित थे और उन्होंने अपने भाई चिमाजी अप्पा को दिल्ली की ओर सहायता भेजने के संबंध में पत्र लिखा था।
लेकिन नादिर शाह के अचानक आक्रमण ने उत्तर भारत की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया।
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15. बाजीराव का निजी जीवन — काशीबाई और मस्तानी
बाजीराव की पत्नी काशीबाई थीं।
उनके जीवन का दूसरा सबसे चर्चित संबंध मस्तानी से जुड़ा है।
मस्तानी को लेकर इतिहास में अलग-अलग विवरण मिलते हैं। बाद के साहित्य, लोककथाओं और फिल्मों ने इस संबंध को बहुत नाटकीय रूप दिया।
इसलिए ऐतिहासिक अध्ययन करते समय प्रमाणित दस्तावेज और बाद की लोकप्रिय कथा अलग-अलग रखना आवश्यक है।
उनके पुत्रों में बालाजी बाजीराव (नानासाहेब), रघुनाथराव और शमशेर बहादुर प्रमुख थे।
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16. बाजीराव की सबसे बड़ी सैन्य विशेषता
बाजीराव का युद्ध कौशल समझने के लिए एक शब्द बहुत महत्वपूर्ण है:
गति।
वे दुश्मन की विशाल सेना से सीधे टकराने के बजाय उसकी कमजोरी पर प्रहार करते थे।
उनकी सेना:
बहुत तेजी से चलती थी
लंबी दूरी कम समय में तय करती थी
दुश्मन की रसद काटती थी
अचानक दिशा बदलती थी
घेराबंदी से बचती थी
दुश्मन को अपनी शर्तों पर लड़ने के लिए मजबूर करती थी
पालखेड़ और दिल्ली अभियान इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
इसीलिए उन्हें केवल “बहादुर योद्धा” कहना पर्याप्त नहीं है।
वे एक असाधारण सैन्य रणनीतिकार भी थे।
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17. अंतिम वर्ष — 1739–1740
लगातार वर्षों तक युद्ध, यात्राएँ और सैन्य अभियान चलाने के कारण उनका शरीर थक चुका था।
वे लगभग लगातार अभियान पर रहते थे।
अप्रैल 1740 में वे नर्मदा क्षेत्र में थे।
23 अप्रैल के आसपास उनकी तबीयत खराब होने लगी और अगले कुछ दिनों में स्थिति बिगड़ गई। 28 अप्रैल 1740 को रावेरखेड़ी में उनका निधन हुआ। उस समय उनकी आयु लगभग 39 वर्ष थी।
उनका अंतिम संस्कार नर्मदा के किनारे किया गया और बाद में वहाँ उनकी स्मृति में स्मारक बनाया गया।
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🚩 18. 20 वर्षों का परिणाम
जब बाजीराव 1720 में पेशवा बने थे, तब मराठा शक्ति का मुख्य केंद्र दक्कन था।
जब 1740 में उनका निधन हुआ, तब मराठा प्रभाव:
महाराष्ट्र
↓
गुजरात
↓
मालवा
↓
बुंदेलखंड
↓
राजस्थान के कुछ हिस्से
↓
दिल्ली तक
पहुँच चुका था।
यह विस्तार अकेले बाजीराव का कार्य नहीं था—छत्रपति शाहू, चिमाजी अप्पा, मल्हारराव होलकर, राणोजी सिंधिया और अनेक मराठा सरदारों का भी इसमें योगदान था। लेकिन बाजीराव ने इस विस्तार को दिशा और गति देने में केंद्रीय भूमिका निभाई।
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🏹 प्रमुख अभियानों की समयरेखा
वर्ष प्रमुख घटना
1700 बाजीराव का जन्म
1720 लगभग 20 वर्ष की आयु में पेशवा बने
1727–28 निजाम के विरुद्ध पालखेड़ अभियान
1729 बुंदेलखंड में छत्रसाल की सहायता
1731 डाभोई का संघर्ष
1730s मालवा और गुजरात में मराठा प्रभाव का विस्तार
1737 दिल्ली अभियान
1737–38 भोपाल अभियान
1738 मालवा पर मराठा अधिकार मजबूत
1739 चिमाजी अप्पा की वसई विजय
1739 नादिर शाह का आक्रमण
28 अप्रैल 1740 रावेरखेड़ी में बाजीराव का निधन
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🚩 बाजीराव की ऐतिहासिक विरासत
बाजीराव की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने मराठा शक्ति को दक्कन की क्षेत्रीय शक्ति से उत्तर भारत की निर्णायक राजनीतिक शक्ति बनने की दिशा में आगे बढ़ाया।
उनकी कहानी केवल तलवार की कहानी नहीं है।
यह कहानी है—
साहस + गति + रणनीति + नेतृत्व + राजनीतिक दूरदृष्टि की।
और सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि उन्होंने यह सब लगभग 20 वर्षों के पेशवा कार्यकाल और केवल 39 वर्ष के जीवन में किया।
