
‘सत्य संवाद’ विशेष
आप सभी पाठकों को ‘काजलैया’ पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं!
रक्षाबंधन के बाद उमड़ता है उत्साह का ज्वार: जानिए क्या है भुजरिया (कजरी) पर्व की परंपरा और ऐतिहासिक महत्व
भोपाल/बुंदेलखंड | सत्य संवाद ब्यूरो: रक्षाबंधन के पावन पर्व के ठीक अगले दिन मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के विभिन्न अंचलों—विशेषकर बुंदेलखंड, ग्वालियर और महाकौशल—में एक अनोखा लोकपर्व पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है। क्षेत्रीय बोलियों और उच्चारण के भेद से इसे भुजरिया, कजरी पूर्णिमा/तीज, काजलैया या स्थानीय भाषा में ‘खच लाह’ के नाम से भी जाना जाता है।
यह त्योहार केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति आभार, भाई-बहन के अटूट स्नेह और आपसी मनमुटाव भूलकर सामाजिक समरसता बढ़ाने का एक जीवंत माध्यम है।
तीन प्रमुख चरणों में सिमटा भक्ति और उल्लास का उत्सव
भुजरिया पर्व का उत्सव मुख्य रूप से तीन चरणों में संपन्न होता है:
- ज्वारे (भुजरिया) बोना: रक्षाबंधन से लगभग एक सप्ताह पूर्व (श्रावण शुक्ल सप्तमी-अष्टमी) घर की महिलाएं और बालिकाएं बांस की टोकरियों में पवित्र मिट्टी डालकर गेहूं या जौ के दाने बोती हैं। नियमित सेवा और जल अर्पण से रक्षाबंधन तक ये दाने लहराते हरे पौधों (ज्वारों) का रूप ले लेते हैं, जिन्हें ‘भुजरिया’ या ‘काजलैया’ कहा जाता है।
- पारंपरिक विसर्जन यात्रा: रक्षाबंधन के अगले दिन, महिलाएं पारंपरिक पोशाक पहनकर और लोकगीत गाते हुए इन भुजरियों को सिर पर रखकर निकटतम पवित्र नदी, तालाब या जलाशय पर पहुंचती हैं। विधि-विधान से पूजा-अर्चना के बाद इन्हें जल में विसर्जित किया जाता है।
- शुभकामनाएं और आशीर्वाद का आदान-प्रदान: विसर्जन के पश्चात भुजरिया के कुछ हरे पौधों को घर लाया जाता है। लोग इन हरी पत्तियों को अपने से बड़ों के कानों पर लगाकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। वहीं, युवा और मित्र आपस में भुजरिया बदलकर गले मिलते हैं और पुरानी कड़वाहटों को भुलाकर एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं।
आल्हा-ऊदल की वीरता से जुड़ा है गौरवशाली इतिहास
इस लोकपर्व का ऐतिहासिक और पौराणिक संबंध महोबा के महान योद्धाओं आल्हा और ऊदल की वीरता से जुड़ा हुआ है। मान्यताओं के अनुसार, चंदेल राजा परमाल की पुत्री राजकुमारी चंद्रावली को बंदी बनाने आए शत्रुओं को आल्हा-ऊदल ने भीषण युद्ध में पराजित किया था।
इस ऐतिहासिक विजय और राजकुमारी की सकुशल वापसी की खुशी में पूरे नगरवासियों ने रक्षाबंधन के अगले दिन गाजे-बाजे के साथ भुजरिया विसर्जन किया और उत्सव मनाया था। तभी से यह विजय और भ्रातृ-प्रेम का प्रतीक बनकर हर साल मनाया जाता है।
सत्य संवाद का संदेश: प्रकृति की हरियाली और अपनों के प्यार को समर्पित ‘काजलैया’ पर्व हम सभी को समाज में प्रेम, शांति और भाईचारे का संदेश देता है।
