महाप्रयाण के 6 वर्ष: भौतिक रूप से दूर होकर भी भक्तों के दिलों में धड़क रहे हैं पूज्य ‘दद्दा जी’

  1. विशेष श्रद्धांजलि: छह वर्ष की भौतिक दूरी, लेकिन भक्तों के दिलों में आज भी जीवंत हैं ‘दद्दा जी’

कटनी। समय का चक्र अपनी गति से निरंतर चलता रहता है, लेकिन कुछ महान विभूतियां ऐसी होती हैं जिनका प्रभाव समय की सीमाओं को लांघ जाता है। परम पूज्य गृहस्थ संत देवप्रभाकर शास्त्री ‘दद्दा जी’ को भौतिक देह त्यागे आज पूरे छह वर्ष बीत चुके हैं। इन छह वर्षों में देश और समाज में बहुत कुछ बदला, लेकिन यदि कुछ नहीं बदला तो वह है—अपने आराध्य के प्रति दद्दा जी शिष्य परिवार की अगाध श्रद्धा, निष्ठा और उनके सिद्धांतों के प्रति समर्पण।

​छह साल की यह लंबी अवधि इस बात का साक्षात प्रमाण है कि गुरु केवल हाड़-मांस का शरीर नहीं, बल्कि एक शाश्वत चेतना होता है। आज भी जब कटनी आश्रम या सिद्धाश्रम ‘घनश्याम बाग’ की पवित्र मिट्टी को भक्त नमन करते हैं, तो उन्हें दद्दा जी की सूक्ष्म उपस्थिति और उनका वह वात्सल्यमयी स्नेहाशीष साफ महसूस होता है। उनकी भौतिक अनुपस्थिति ने शिष्यों के भीतर के वैराग्य और भक्ति को और अधिक प्रगाढ़ किया है।

शिष्य परिवार ने पेश की अद्वितीय मिसाल, अनवरत जारी हैं सेवा कार्य

​आमतौर पर देखा जाता है कि किसी बड़े व्यक्तित्व के जाने के बाद समय के साथ उनके द्वारा शुरू किए गए अनुष्ठान और सामाजिक कार्य धीमे पड़ जाते हैं। परंतु दद्दा जी का शिष्य मंडल और उनका विशाल परिवार इस मामले में एक अद्वितीय मिसाल पेश कर रहा है। सवा करोड़ पार्थिव शिवलिंग निर्माण की जो अलख उन्होंने जगाई थी, वह ज्योति आज भी उतनी ही प्रखरता से जल रही है।

​देश-विदेश में बिखरे उनके लाखों शिष्य—चाहे वे राजनीति के शीर्ष पर बैठे लोग हों, फिल्म जगत की नामचीन हस्तियां हों, या फिर दूरदराज के गांवों में रहने वाले गरीब किसान और मजदूर—सभी आज भी उसी ‘समभाव’ के सूत्र में बंधे हैं, जो दद्दा जी ने उन्हें सिखाया था।

आचरण में उतरा धर्म: ‘कर्म ही पूजा है’ का मार्ग

​दद्दा जी की अनुपस्थिति में भक्तों की यह अटूट श्रद्धा दर्शाती है कि उनका ज्ञान केवल प्रवचनों तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने अपने शिष्यों के आचरण में धर्म को उतारा था। आज भी जब दद्दा जी के स्मरण में विशाल भंडारे आयोजित होते हैं, जब अनाथ कन्याओं के विवाह और शिक्षा के लिए उसी संकल्प के साथ ‘नारियल’ की भेंट का सदुपयोग किया जाता है, तो यह अहसास होता है कि दद्दा जी कहीं गए नहीं हैं। वे अपने शिष्यों के सेवा कार्यों में, उनकी सादगी में और उनकी अटूट शिव-भक्ति में निरंतर सांस ले रहे हैं।

​आज उनके महाप्रयाण के छह वर्ष पूरे होने पर, शून्य का यह अहसास भले ही आंखों को नम कर जाता हो, लेकिन उनका दिखाया ‘कर्म ही पूजा है’ का मार्ग भक्तों को संबल देता है। आडंबर रहित जीवन, हर जाति-धर्म का सम्मान और पीड़ित मानवता की निःशुल्क सेवा का जो विचार वे छोड़ गए हैं, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रकाश स्तंभ बना रहेगा।

 

​भौतिक रूप से भले ही छह वर्ष बीत गए हों, लेकिन दद्दा जी की स्मृतियां, उनकी अमृतमयी वाणी और उनके आदर्श आज भी सनातन संस्कृति के आकाश में ध्रुवतारे की तरह चमक रहे हैं। ‘सत्य संवाद समाचार’ परिवार की ओर से पूज्य दद्दा जी के चरणों में कोटि-कोटि नमन और विनम्र भावांजलि!

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