*विपरीत परिस्थितियों में देश को संभालता कौन है? — आम आदमी*
जब भी दुनिया युद्ध, संकट, आर्थिक अस्थिरता और भय के दौर से गुजरती है, तब सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं होता कि बड़े लोग कितना कमा रहे हैं, बल्कि यह होता है कि आम आदमी कैसे जी रहा है। क्योंकि किसी भी देश की वास्तविक ताकत उसके महलों, बड़ी-बड़ी गाड़ियों, ऊंची इमारतों या विदेशों में फैले व्यापार से नहीं मापी जाती, बल्कि उस आम आदमी से मापी जाती है जो हर कठिन परिस्थिति में अपने परिवार, समाज और देश को अपने कंधों पर उठाकर चलता है।
आज पूरी दुनिया युद्ध और तनाव के दौर से गुजर रही है। कहीं प्रत्यक्ष युद्ध चल रहे हैं, कहीं आर्थिक युद्ध, कहीं व्यापारिक संघर्ष, तो कहीं संसाधनों पर कब्जे की लड़ाई। इसका सबसे बड़ा असर उस आम इंसान पर पड़ता है जो न तो युद्ध चाहता है, न राजनीति समझता है, न वैश्विक रणनीतियां। वह केवल इतना जानता है कि उसके घर का चूल्हा जलना चाहिए, उसके बच्चों की पढ़ाई चलती रहनी चाहिए और उसके परिवार का जीवन सुरक्षित रहना चाहिए।
लेकिन विडंबना यह है कि हर वैश्विक संकट का सबसे बड़ा बोझ उसी आम आदमी के हिस्से में आता है।
आम आदमी विदेश जाने के सपने नहीं देखता। उसकी पूरी जिंदगी अपने गांव, अपने शहर, अपनी मिट्टी और अपने परिवार के बीच गुजर जाती है। वह यह नहीं सोचता कि किस देश में निवेश करना है, कहां संपत्ति खरीदनी है या किस विदेशी बाजार में पैसा लगाना है। उसकी सबसे बड़ी चिंता होती है कि महीने का राशन कैसे आएगा, बच्चों की फीस कैसे भरेगा और बीमार पड़ने पर इलाज कहां से कराएगा।
सोना उसके लिए कोई निवेश नहीं होता, बल्कि भावनाओं और सामाजिक जिम्मेदारी का प्रतीक होता है। वह जीवनभर की बचत सिर्फ इसलिए जोड़ता है ताकि बेटी की शादी में समाज के सामने सम्मान बना रहे। वह अपनी पूरी कमाई लगाकर नाम मात्र का सोना खरीदता है, क्योंकि उसके लिए वह धन नहीं, परिवार की इज्जत और परंपरा का हिस्सा होता है। लेकिन आज जब सोने के दाम आसमान छू रहे हैं, तब वही आम आदमी सोचने को मजबूर है कि पेट के लिए संघर्ष करे या सामाजिक जिम्मेदारियां निभाए।
बड़ी-बड़ी गाड़ियां, लंबी यात्राएं और रोज हजारों का पेट्रोल-डीजल खर्च आम आदमी की जिंदगी का हिस्सा नहीं हैं। उसके लिए तो मोटरसाइकिल में डलने वाला थोड़ा-सा पेट्रोल भी कई बार सोचने का विषय बन जाता है। वह हर किलोमीटर का हिसाब लगाता है, क्योंकि उसकी कमाई सीमित होती है। जो लोग रोज बड़ी गाड़ियों में घूमते हैं, एयर कंडीशन दफ्तरों में बैठकर फैसले लेते हैं, शायद उन्हें कभी एहसास नहीं होता कि पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतें गांव के किसान, मजदूर, रिक्शा चालक और छोटे दुकानदार की जिंदगी पर कितना भारी असर डालती हैं।
आम आदमी का जीवन संघर्ष से भरा होता है। सुबह से शाम तक मेहनत करने के बाद भी उसे भविष्य की कोई निश्चितता नहीं मिलती। फिर भी जब देश पर संकट आता है, वही सबसे पहले खड़ा होता है। वह अपनी जरूरतें सीमित कर लेता है, अपने खर्च कम कर देता है, अपने सपनों को रोक देता है, लेकिन देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हटता।
युद्ध और वैश्विक तनाव का असर सिर्फ सीमाओं तक सीमित नहीं रहता। जब दुनिया में युद्ध होता है तो तेल महंगा होता है, खाने-पीने की चीजें महंगी होती हैं, व्यापार प्रभावित होता है, रोजगार कम होते हैं और महंगाई बढ़ती है। इसका असर सबसे ज्यादा उस वर्ग पर पड़ता है जिसकी आय सीमित होती है। अमीर आदमी अपनी सुविधाएं बनाए रखता है, लेकिन आम आदमी अपनी जरूरतों में कटौती करता है। वह अपने बच्चों की छोटी इच्छाएं टाल देता है, खुद नए कपड़े नहीं खरीदता, त्योहारों को सादगी से मनाता है, लेकिन देश और परिवार को टूटने नहीं देता।
यही आम आदमी की सबसे बड़ी ताकत है।
कल जिस प्रकार देश के नेतृत्व द्वारा यह कहा गया कि राष्ट्रहित सर्वोपरि है और कठिन परिस्थितियों में देशवासियों को मिलकर खड़ा होना होगा, उसका वास्तविक अर्थ भी यही है कि देश की असली शक्ति आम जनता ही है। क्योंकि इतिहास गवाह है कि जब-जब संकट आया है, तब-तब बड़े महलों से ज्यादा मजबूत झोपड़ियां साबित हुई हैं। सीमाओं पर सैनिक लड़ता है, लेकिन उसके पीछे खड़ा किसान खेत में अन्न उगाता है, मजदूर कारखाने चलाता है, छोटा दुकानदार बाजार संभालता है और आम नागरिक देश की अर्थव्यवस्था को जीवित रखता है।
देश की संप्रभुता, अखंडता और विकास केवल भाषणों से सुरक्षित नहीं रहते। उन्हें सुरक्षित रखने के लिए करोड़ों आम लोगों का त्याग लगता है। वह किसान जो महंगे डीजल के बावजूद खेत जोतता है, वह मजदूर जो कम मजदूरी में भी काम करता है, वह मध्यमवर्गीय परिवार जो अपनी इच्छाएं रोककर बच्चों को पढ़ाता है — यही लोग राष्ट्र निर्माण की वास्तविक नींव होते हैं।
लेकिन सबसे दुखद सत्य यह है कि जिस आम आदमी के त्याग पर पूरा देश खड़ा होता है, उसी की पीड़ा सबसे कम सुनी जाती है। बड़े लोग अपने संसाधनों और सुविधाओं के साथ आराम से जीवन जी लेते हैं। आर्थिक संकट हो या युद्ध, उनके जीवन में बहुत बड़ा बदलाव नहीं आता। लेकिन आम आदमी की छोटी-सी दुनिया पूरी तरह हिल जाती है। उसकी रसोई, उसकी कमाई, उसका भविष्य और उसके बच्चों के सपने सीधे प्रभावित होते हैं।
फिर भी वह टूटता नहीं।
वह शिकायत कम करता है और जिम्मेदारी ज्यादा निभाता है। यही कारण है कि विपरीत परिस्थितियों में देश को वास्तव में संभालने वाला आम आदमी ही होता है। वह केवल अपने परिवार का पालनकर्ता नहीं, बल्कि राष्ट्र की वास्तविक रीढ़ होता है।
जब पूरी दुनिया संघर्ष में उलझी होती है, तब आम आदमी ही सबसे ज्यादा धैर्य दिखाता है। वह युद्ध नहीं चाहता, लेकिन देश की सुरक्षा के लिए हर त्याग करने को तैयार रहता है। वह विलासिता नहीं मांगता, सिर्फ सम्मानजनक जीवन चाहता है। वह सत्ता नहीं चाहता, सिर्फ स्थिरता चाहता है। वह विशेष अधिकार नहीं चाहता, सिर्फ इतना चाहता है कि उसकी मेहनत का मूल्य समझा जाए।
आज आवश्यकता इस बात की है कि देश और दुनिया दोनों यह समझें कि किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी उसके बड़े उद्योगपति, बड़े महल या बड़ी अर्थव्यवस्था नहीं होते, बल्कि वह आम आदमी होता है जो हर परिस्थिति में देश को टूटने नहीं देता।
जब देश कठिन दौर में होता है तो वही आम आदमी अपने खर्च कम करता है, टैक्स देता है, मेहनत करता है, कानून का पालन करता है और देश की व्यवस्था को जीवित रखता है। इसलिए अगर वास्तव में राष्ट्र निर्माण करना है, तो सबसे पहले उस आम आदमी के संघर्ष, त्याग और योगदान को समझना होगा।
क्योंकि अंत में इतिहास यही साबित करता है कि देश बड़े लोगों के आराम से नहीं, बल्कि आम आदमी के संघर्ष से चलता है।
*— सत्य प्रकाश द्विवेदी (प्रदीप महाराज ✍️)*
